कबीर ग्रंथावली (संपादक- हजारी प्रसाद द्विवेदी) पद संख्या 202 अर्थ सहित
पद: 202 कबीरा प्याला प्रेमका, अंतर दिया लगाय। रोम रोमसे रमि रह्या, और अमल क्या खाए।।1।। कबीरा हम गुरु-रस पिया, बाकी रही न छाक। पाका कलस कुम्हार का, बहुरि न चढ़सी चाक।।2।। राता-माता नामका, पीया प्रेम अघाय। मातवाला दीदार का, माँगें मुक्ति बलाय।।3।। भावार्थ :- कबीर दास जी कहते हैं कि मैं प्रेम का … Read more