|| एक टोकरी-भर मिट्टी || माधवराव सप्रे ||

किसी श्रीमान् जमींदार के महल के पास एक गरीब अनाथ विधवा की झोंपड़ी थी। जमींदार साहब को अपने महल का हाता उस झोंपड़ी तक बढ़ाने की इच्‍छा हुई, विधवा से बहुतेरा कहा कि अपनी झोंपड़ी हटा ले, पर वह तो कई जमाने से वहीं बसी थी। उसका प्रिय पति और इकलौता पुत्र भी उसी झोंपड़ी … Read more

|| राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह || कानों में कँगना ||

1 “किरन! तुम्हारे कानों में क्या है?” उसके कानों से चंचल लट को हटाकर कहा – “कँगना।” “अरे! कानों में कँगना?” सचमुच दो कंगन कानों को घेरकर बैठे थे। “हाँ, तब कहाँ पहनूँ?” किरन अभी भोरी थी। दुनिया में जिसे भोरी कहते हैं, वैसी भोरी नहीं। उसे वन के फूलों का भोलापन समझो। नवीन चमन … Read more

|| अपना-अपना भाग्य || जैनेंद्र कुमार ||

बहुत कुछ निरुदेश्य घूम चुकने पर हम सड़क के किनारे की एक बेंच पर बैठ गए। नैनीताल की संध्या धीरे-धीरे उतर रही थी। रूई के रेशे-से भाप से बादल हमारे सिरों को छू-छूकर बेरोक-टोक घूम रहे थे। हल्के-हल्के प्रकाश और अंधियारी से रंगकर कभी वे नाले दीखते, कभी सफ़ेद और फिर देर में अरुण पड़ … Read more

|| गैंग्रीन || रोज || अज्ञेय ||

‘रोज़’ शीर्षक कहानी अज्ञेय के कहानी संकलन ‘विपथगा’ के पहले संस्करण में है। पर ‘विपथगा’ के पाँचवें संस्करण में, जो सन् 1990 ई. में नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुआ, यही कहानी ‘गैंग्रीन’ शीर्षक से प्रकाशित है। इस कहानी में अज्ञेय ने मध्यवर्गीय जीवन में नित्य की दिनचर्या के कारण व्याप्त एकरसता तथा उबाऊपन … Read more

|| अमृतसर आ गया है || भीष्म साहनी ||

विशेष “: प्रगतिशील लेखक संघ से गहरा लगाव और 1973 से 1986 तक प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव। अफ्रो-एशियाई लेखक संघ से भी संबद्ध रहे। पत्रकारिता और जन नाट्य संघ से लगाव और सक्रियता। कुछ नाटकों और फिल्मों में अभिनय भी किया।” ————————————————————————————————————— गाड़ी के डिब्बे में बहुत मुसाफिर नहीं थे। मेरे सामनेवाली सीट … Read more

|| चीफ की दावत || भीष्म साहनी ||

आज मिस्टर शामनाथ के घर चीफ की दावत थी। शामनाथ और उनकी धर्मपत्नी को पसीना पोंछने की फुर्सत न थी। पत्नी ड्रेसिंग गाउन पहने, उलझे हुए बालों का जूड़ा बनाए मुँह पर फैली हुई सुर्खी और पाउड़र को मले और मिस्टर शामनाथ सिगरेट पर सिगरेट फूँकते हुए चीजों की फेहरिस्त हाथ में थामे, एक कमरे … Read more

|| कृष्णा सोबती || सिक्का बदल गया ||

खद्दर की चादर ओढ़े, हाथ में माला लिए शाहनी जब दरिया के किनारे पहुंची तो पौ फट रही थी। दूर-दूर आसमान के परदे पर लालिमा फैलती जा रही थी। शाहनी ने कपड़े उतारकर एक ओर रक्खे और ‘श्रीराम, श्रीराम’ करती पानी में हो ली। अंजलि भरकर सूर्य देवता को नमस्कार किया, अपनी उनीदी आंखों पर … Read more

|| इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर || हरिशंकर परसाई ||

वैज्ञानिक कहते हैं, चाँद पर जीवन नहीं है। सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर मातादीन (डिपार्टमेंट में एम. डी. साब) कहते हैं- वैज्ञानिक झूठ बोलते हैं, वहाँ हमारे जैसे ही मनुष्य की आबादी है। विज्ञान ने हमेशा इन्स्पेक्टर मातादीन से मात खाई है। फिंगर प्रिंट विशेषज्ञ कहता रहता है- छुरे पर पाए गए निशान मुलज़िम की अँगुलियों के … Read more

|| ज्ञानरंजन || पिता || 

उसने अपने बिस्तरे का अंदाज लेने के लिए मात्र आध पल को बिजली जलाई। बिस्तरे फर्श पर बिछे हुए थे। उसकी स्त्री ने सोते-सोते ही बड़बड़ाया, ‘आ गए’ और बच्चे की तरफ करवट लेकर चुप हो गई। लेट जाने पर उसे एक बड़ी डकार आती मालूम पड़ी, लेकिन उसने डकार ली नहीं। उसे लगा कि … Read more

|| कमलेश्वर || राजा निरबंसिया ||

”एक राजा निरबंसिया थे,” मां कहानी सुनाया करती थीं। उनके आसपास ही चार-पांच बच्चे अपनी मुठ्ठियों में फूल दबाए कहानी समाप्त होने पर गौरों पर चढाने के लिए उत्सुक-से बैठ जाते थे। आटे का सुन्दर-सा चौक पुरा होता, उसी चौक पर मिट्टी की छः गौरें रखी जातीं, जिनमें से ऊपरवाली के बिन्दिया और सिन्दूर लगता, … Read more