66. महाकवि निराला की कविताओं में ‘बादल’ किसका प्रतीक बनकर आया है ?
(A) नूतन भावोल्लास
(B) ध्वंस-सृजन और क्रांति
(C) नवीन चेतना
(D) उत्सर्ग का भाव
MPPSC सहायक प्राध्यापक परीक्षा-2022 द्वितीय प्रश्न पत्र हिंदी परीक्षा तिथि-09/06/2024-SET-B
उत्तर – (B) ध्वंस-सृजन और क्रांति
बादल राग कविता ‘अनामिका’ काव्य से ली गई है। निराला को वर्षा ऋतु अधिक आकृष्ट करती है, क्योंकि बादल के भीतर सृजन और ध्वंस की ताकत एक साथ समाहित है। बादल किसान के लिए उल्लास और निर्माण का अग्रदूत है तो मजदूर के संदर्भ में क्रांति और बदलाव। ‘बादल राग’ निराला जी की प्रसिद्ध कविता है।
67. किस रीति में सुकुमारता और मधुरता का अभाव रहता है ?
(A) वैदर्भी
(B) पांचाली
(C) गौडीया
(D) इनमें से कोई नहीं
MPPSC सहायक प्राध्यापक परीक्षा-2022 द्वितीय प्रश्न पत्र हिंदी परीक्षा तिथि-09/06/2024-SET-B
उत्तर – (C) गौडीया
वैदर्भी -धुर्य व्यंजक वर्णे:रचना ललितात्मका ।
आवृत्तिरल्यवृत्तिर्या वैदर्भी रीति रिष्यते ॥
अर्थात माधुर्य व्यञ्जक वर्णों से युक्त, समासरहित ललित प रचना को ‘वैदर्भी’ रीति कहते हैं। यह रीति श्रृंगार रस, करुण रस एवं शान्त रस के लिए अधिक अनुकूल होती है।
गौडी रीति – गौडी रीति को ‘परुषा’ भी कहते हैं। इसमें दीर्घ-समास-युक्त पदावली का प्रयोग उचित माना जाता है। मधुरता और सुकुमारिता का इससे कोई सम्बन्ध नहीं है।इस दृष्टि से वीर रस, रौद्र रस, भयानक रस और वीभत्स रस की निष्पत्ति में गौडी रीति का भरपूर परिपाक होता है। युद्ध आदि वर्णन इस रीति के प्राण हैं। इसमें ललकार, चुनौती और उद्दीपन का बाहुल्य होता है। कर्ण-कटु शब्दावली और महाप्राण जैसे- ट ,ठ ,ड ,ढ ,ण तथा ह आदि का प्रयोग इसमें अधिक होता है। गौडी या परुषा रीति का काव्य कठिन माना जाता है।
आचार्य मम्मट इसे परिभाषित करते हुए कहते है है –
ओजः प्रकाशकैस्तुपरूषा (अर्थात जहाँ ओज गुण का प्रकाश होता है, वहां ‘परुषा’ रीति होती है।)
हिन्दी में गौडी रीति का एक उदाहरण देखिए-
देखि ज्वाल-जालु, हाहाकारू दसकंघ सुनि,
कह्यो धरो-धरो, धाए बीर बलवान हैं।
लिएँ सूल-सेल, पास-परिध, प्रचंड दंड
भोजन सनीर, धीर धरें धनु-बान है।
‘तुलसी’ समिध सौंज, लंक जग्यकुंडु लखि,
जातुधान पुंगीफल जव तिल धान है।
स्रुवा सो लँगूल, बलमूल प्रतिकूल हबि,
स्वाहा महा हाँकि-हाँकि हुनैं हनुमान हैं। (कवितावली)
पाञ्चाली रीति न तो वैदर्भी की भांति समासरहित होती है और न गौडी की भांति समास-जटित। यह मध्यममार्ग है जिसमें छोटे-छोटे समास अवश्य मिलते हैं।
68. किस आचार्य ने समाधि (एकाग्रता) और अभ्यास से उत्पन्न ‘शक्ति’ को काव्य-हेतु माना है ?
(A) भामह
(B) रुद्रक
(C) पंडितराज जगन्नाथ
(D) राजशेखर
MPPSC सहायक प्राध्यापक परीक्षा-2022 द्वितीय प्रश्न पत्र हिंदी परीक्षा तिथि-09/06/2024-SET-B
उत्तर – (D) राजशेखर
इकाई 5 काव्य हेतु एवं काव्य-प्रयोजन
रूद्रट (नवम शताब्दी ई. का आरंभ) आचार्य रूद्रट ने प्रतिभा के साथ व्युत्पत्ति और अभ्यास को (3 hetu) भी काव्य हेतुओं में महत्व दिया है। प्रतिभा के रूद्रट ने दो भेद भी किए हैं- सहजा, जो जन्मजात होती है तथा उत्पाद्या जो शास्त्र तथा लोक से अर्जित की जाती है। रूद्रट प्रतिभा को काव्य का मूल हेतु स्वीकार करते हैं और उसे ही शक्ति मानते हैं।
भामह (छठी शताब्दी वि.): भामह भारतीय काव्यशास्त्र के आदि आचार्य माने जाते हैं। इनका प्रसिद्ध ग्रंथ ‘काव्यालंकार’ है, जिसमें प्रतिभा के संबंध में उनके मौलिक विचार व्यक्त हुए हैं। आचार्य भामह प्रतिभा को काव्य-रचना का प्रमुख हेतु (1) मानते हैं। प्रतिभा के द्वारा ही श्रेष्ठ काव्य-रचना हो सकती है किंतु उनके मतानुसार यह प्रतिभा किसी विरले में ही दृष्टिगत होती है –
जड़बुद्धि भी गुरु के उपदेश से शास्त्र का ज्ञाता हो सकता है किंतु काव्य-रचना तो किसी प्रतिभावान से ही हो सकती है। इस प्रकार आचार्य भामह के अनुसार दोषरहित श्रेष्ठ काव्य की रचना का प्रमुख हेतु प्रतिभा है।
राजशेखर
इन्होंने माना कि “प्रतिभा व्युत्पत्ति मिश्रः समवेते श्रेयस्यौ इति” (02 hetu)अर्थात् प्रतिभा और व्युत्पत्ति दोनों समवेत रूप में काव्य के श्रेयस्कार हेतु हैं। राजशेखर प्रतिभा के दो भेद स्वीकारते है — कारयित्री एवं भावयित्री। कारयित्री प्रतिभा जन्मजात होती है तथा इसका सम्बन्ध कवि या रचनाकार से है। भावयित्री प्रतिभा का सम्बन्ध सहृदय पाठक या आलोचक से है। कारयित्री प्रतिभा भी तीन प्रकार की होती है — सहजा, आहार्या तथा औपदेशिकी। सहजा अर्थात् जो पूर्व जन्म के संस्कार से उत्पन्न होती है तथा इसमें जन्मांतर संस्कार की अपेक्षा होती है। आहार्या का उदय इसी जन्म के संस्कारों से होता है जबकि औपदेशिकी की उत्पत्ति मंत्र, तंत्र, देवता तथा गुरु आदि के उपदेश से होती है।
पंडितराज जगन्नाथ
इन्होंने प्रतिभा को ही एकमात्र काव्यहेतु स्वीकार किया। (01 hetu)प्रतिभा के दो भेदों — कारयित्री एवं भावयित्री को मानते हुए भी इन्होंने केवल कारयित्री प्रतिभा को महत्व दिया। केवल प्रतिभा को ही काव्यहेतु मानने के कारण इन्हें ‘केवल प्रतिभावादी’ (“प्रतिभैवकेवला कारणम्”) भी कहा जाता है। प्रतिभा के बारे में उनका मत है कि काव्य-रचना के अनुकूल शब्दार्थ की उपस्थितिमात्र करानेवाली क्षमता है — “सा च काव्यघटनानुकूलशब्दार्थोपस्थिति।”। उन्होंने प्रतिभा के तीन विभाग किए — अदृष्ट, व्युत्पत्ति और अभ्यास। अदृष्ट प्रतिभा की उत्पत्ति देवकृपा, महापुरुष आदि के वरदान से होती है। किसी-किसी में व्युत्पत्ति एवं अभ्यास के अभाव में भी शैशवावस्था से काव्य-निर्माण की क्षमता आ जाती है। अतः व्युत्पत्ति एवं अभ्यास को काव्य का कारण न मानकर एकमात्र प्रतिभा को ही माना जा सकता है। जगन्नाथ ने यह भी माना है कि प्रतिभा की विविधता और विलक्षणता के कारण ही काव्य में विविधता और विलक्षणता आती है।
69. ‘काव्यं सद् दृष्टादृष्टार्थं प्रीतिकीर्ति हेतुत्वात् ।’ काव्य प्रयोजन के संदर्भ में किसका कथन है ?
(A) भामह
(B) मम्मट
(C) वामन
(D) विश्वनाथ
MPPSC सहायक प्राध्यापक परीक्षा-2022 द्वितीय प्रश्न पत्र हिंदी परीक्षा तिथि-09/06/2024-SET-B
उत्तर – (C) वामन
वामन
इनके अनुसार काव्य के मुख्यतः दो प्रयोजन हैं – दृष्ट एवं अदृष्ट। दृष्ट प्रयोजन का संबंध प्रीति से है तो अदृष्ट का संबंध कीर्ति से। प्रीति के द्वारा लौकिक फल की तो कीर्ति द्वारा अलौकिक फल की प्राप्ति होती है।
“काव्यं सत् दृष्टादृष्टार्थ प्रीतिकीर्त्तिहेतुत्वात्।
काव्यं सत् चारु, दृष्टप्रयोजनं प्रीतिहेतुत्वात्।
अदृष्ट प्रयोजनं कीर्त्तिहेतुत्वात्।” (काव्यालंकारसूत्रवृत्ति, १/१/५)
Source : https://hi.wikibooks.org/wiki/भारतीय_काव्यशास्त्र/काव्य_प्रयोजन
70. यॉ रहीम जस होत है, उपकारी के संग । बाँटन वारे को लगय ज्यौ मेहंदी को रंग ।।” प्रस्तुत उदाहरण किस अलंकार का है ?
(A) दृष्टांत
(B) उदाहरण
(C) निदर्शना
(D) असंगति
MPPSC सहायक प्राध्यापक परीक्षा-2022 द्वितीय प्रश्न पत्र हिंदी परीक्षा तिथि-09/06/2024-SET-B
उत्तर – (B) उदाहरण
जहाँ किसी बात के समर्थन में उदाहरण किसी वाचक शब्द के साथ दिया जाय, वहाँ उदाहरण अलंकार होता है।
उदाहरण – यॉ रहीम जस होत है, उपकारी के संग ।
बाँटन वारे को लगय ज्यौ मेहंदी को रंग ।।
स्पष्टीकरण – ‘दृष्टान्त’ में दोनों वाक्यों में बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव रहता है तथा कोई वाचक शब्द नहीं होता जबकि ‘उदाहरण’ में दोनों वाक्यों का साधारण धर्म तो भिन्न रहता है लेकिन वाचक शब्द के द्वारा उनमें समानता प्रदर्शित की जाती है। इसमें वाचक शब्द ज्यों है। अतः यह पर उदाहरण अलंकार है।
उदाहरण – बूँद अघात सहँ गिरि कैसे।
खल के वचन संत सह जैसे ॥
स्पष्टीकरण – उपरोक्त उदाहरणों में उदाहरण वाची शब्द ‘जैस’, ‘जस’ और ‘जैसी’ शब्दों द्वारा प्रथम पंक्ति के अर्थ को और अधिक प्रभावशाली बनाया जा रहा है।
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