Why language policy matters in New Education Policy 2020
।। मनोज कुमार धुर्वे।।
परिचय
भाषा विज्ञान के अनुसार भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं होती बल्कि संस्कृति भाषा में समाहित होती है। वह पूरी तरह उसमें संश्लेषित होती, संश्लिष्ट होती है। इसलिए भाषा को केवल संप्रेषण के माध्यम के रूप में त्यागा बदला या परिवर्तित नहीं किया जा सकता। क्योंकि यदि हम अपनी भाषा का परिवर्तन करते हैं तो हम अपनी समग्र संस्कृति और संस्कृति से जुड़े हुए अपने अस्तित्व को भी बदल डालते हैं। यदि आप ब्रेड कहते हैं तो उसका अर्थ भारत की रोटी नहीं होता बल्कि उसका अर्थ ब्रेड होता है। भले ही स्कूल की शिक्षाओं में यह सिखाया गया कि ब्रेड का अर्थ रोटी होता है। अनुवाद विज्ञान कहता है कि अनुवाद असंभव है क्योंकि एक भाषा और दूसरी भाषा की संस्कृति भिन्न होती है और संस्कृतियों का अनुवाद नहीं किया जा सकता। इसलिए भाषा हमारे अस्तित्व का प्रतीक है।
यूनिसेफ ने 50 के दशक में जो घोषित किया वो आज भी हम न कर पाये:
अब यह बात किसी से छुपी नहीं है की तकनीकी न्याय और दूसरे विषयों के अध्ययन की भाषा कोई भी हो सकती है। 50 और 60 के दशक में ही संयुक्त राष्ट्र संघ के विभागों ने यह घोषित कर दिया था कि किसी भी बच्चे के लिए स्कूल में उसकी शिक्षा का माध्यम उसकी अपनी मातृभाषा ही चाहिए।
काले अंग्रेजों का शासन
किंतु भारत ही एक ऐसा देश है जो अंग्रेजों की उन सभी नीतियों का पालन कर रहा है या कर रहा था जो अंग्रेजों ने उन्हें नीचा दिखाने के लिए बनाई थी।
उन्हें सांस्कृतिक रूप से नीचा दिखाने के लिए, उन्हें परंपरागत रूप से नीचा दिखाने के लिए, उन्हें धार्मिक रूप से नीचे दिखाने के लिए बनाई थी। यह हमारे देश का दुर्भाग्य ही है कि हम उनके द्वारा बनाए गए सभी अधिनियम और कानून का अब तक कड़ाई से और स्वेच्छा से पालन कर रहे हैं। जबकि यह आवश्यक नहीं कि हम उनका पालन करें। हम चाहें तो उन्हें कभी भी बदला जा सकता है।
उच्च शिक्षा में अंग्रेजों और अंग्रेजी की गुंडागर्दी गलत है
हमारे मन में यह भ्रम है कि इंजीनियरिंग तकनीकी मेडिकल और कानून की पढ़ाई केवल अंग्रेजी में ही की जा सकती है।
किंतु यह कितना बड़ा भ्रम है जबकि सारा संसार जहां एक गांव बन गया है और लोग घंटे भर में एक देश से दूसरे देश तीसरे देश चौथा देश जाते रहते हैं। संसार के अनेक देशों में जैसे आप पोलैंड को ले लीजिए, जैसे आप इसराइल को ले लीजिए, जैसेआप फ्रांस को ले लीजिए, ऐसे कोई भी देश जो संसार में जाने-माने हो उनको ले लीजिए। वे सभी लोग अपने देश में अपनी शिक्षा का माध्यम और केवल स्कूली शिक्षा का माध्यम नहीं, तकनीकी शिक्षा का माध्यम, चिकित्सा शिक्षा का माध्यम, न्यायिक शिक्षा का माध्यम वे लोग अपनी भाषा ही रखते हैं। यूट्यूब पर अनेकों बार यह बात वायरल होती है। अनेक लोगों ने इन बातों पर किताबें लिखी है कि वह देश जहां पर भारतीय विद्यार्थी पढ़ने के लिए जाते हैं तो वह उनकी भाषा सीख कर और उनकी भाषा में ही मेडिकल साइंस की पढ़ाई करते हैं। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करते हैं। और इस ज्ञान के आधार पर फिर अपना जीवन यापन करते हैं। भारत में या दूसरे स्थान पर अपनी नौकरी करते हैं।
भारतीयता और भाषाओं का सम्मान करें
किंतु यह कैसी विडंबना है कि जब भारत की बात आती है तो यहां के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और दूसरे सभी संस्थान और उनके विद्यार्थी वहां के शिक्षक इस बात का विरोध करते हैं कि हम हमारी भारतीय भाषाओं में प्रौद्योगिकी का अध्ययन नहीं कर सकते। हमारे यहां के बड़े-बड़े संस्थान वहां पर संस्कृत हिंदी या कोई भी तमिल तेलुगू आदि भारतीय मूल की भाषाओं में पीएचडी करवाने में अपनी असमर्थता जाहिर करते हैं। यह केवल भारत में ही संभव है। उन सब को भारतीय भाषाओं में अध्ययन अध्यापन एवं विचार विमर्श करने के लिए बहुत ही कठिनाई का अनुभव होता है ऐसा वे दिखाते हैं। जबकि अंग्रेजी जो कि विदेशी भाषा है और आज भी वह भारतीय सामान्य जनमानस के लिए एक मुसीबत बनी हुई है क्योंकि भारतीय जनमानस उस माहौल में नहीं रहता जहां अंग्रेजी बोली जाती है और इसलिए वे अंग्रेजी इतनी अच्छी तरह से नहीं जानते। किंतु आज भी हमारे यहां पर जो बड़े-बड़े संस्थान हैं चिकित्सा शिक्षा के, इंजीनियरिंग की शिक्षा के, तकनीकी की शिक्षा के और विधिक सेवा अथवा न्यायिक शिक्षा के उन सभी संस्थाओं में शिक्षा केवल अंग्रेजी माध्यम में ही दी जाती है। और ऐसा माना जाता है कि जो विद्यार्थी अंग्रेजी माध्यम से अपनी शिक्षा ग्रहण करता है वह बहुत ही बुद्धिमान हो जाता है।
अंग्रेज़ी बुद्धिमत्ता का कारण कैसे?
अब यह कैसा सिद्धांत है कि किसी भाषा से कोई व्यक्ति बुद्धिमान हो जाता है। अगर ऐसा है तो ब्रिटेन के और जहां पर अंग्रेजी बोली जाती है चुनिंदा दो-चार देश संसार के वहां के सभी लोग बुद्धिमान होने चाहिए। किंतु अमेरिका में तो पागलों की संख्या बहुत अधिक है और वहां पर जो है भारत के अधिकांश पागलों के डॉक्टर अमेरिका चले जाते हैं क्योंकि वहां उनकी बहुत कमाई होती है। तो यह एक बड़ा भ्रम है और इस भ्रम को हमें शीघ्र ही मिटाना चाहिए।
नई नीति और भाषा
नई शिक्षा नीति ने जो यह प्रावधान किया है कि शीघ्रता से भारतीय भाषाओं में इन विषयों तकनीकी चिकित्सा न्याय आदि विषयों की पाठ्य पुस्तकें अपनी भाषा में लिखी जाएं और विद्यार्थियों को यह सहूलियत दी जाए कि वह उनके उत्तर जो प्रश्न पत्र भले अंग्रेजी भाषा में हो या किसी भाषा में हो वह अपनी भाषा में उत्तर लिख सके। यह उन्हें स्वतंत्रता मिलनी ही चाहिए। विशेष कर जो बच्चे गरीब घरों से जाते हैं ग्रामीण परिवेश से जाते हैं वे उनके परिवेश के अलावा दूसरी भाषाओं को अच्छी तरह से नहीं जान पाते हैं। जबकि उनमें प्रतिभा कूट-कूट कर भरी रहती है। किंतु भाषा उनके लिए ऐसी बाधा उत्पन्न करती है कि वे विद्यार्थी बड़े-बड़े संस्थानों में प्रवेश लेने के उपरांत केवल भाषा की कठिनाई के लिए और वहां के अंग्रेजी भाषा के प्रति सम्मान रखने वाले अंग्रेजियत के गुलाम मानसिकता वाले शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के कारण इतने तिरस्कृत किए जाते हैं इतने अपमानित किए जाते हैं कि वे परेशान होकर पढ़ना छोड़ देते हैं। अनेक विद्यार्थी तो आत्महत्या तक कर लेते हैं। और अनेक विद्यार्थी अपना कोर्स छोड़कर अपने गांव चले जाते हैं और तनाव ग्रस्त होकर कभी-कभी अपनी पढ़ाई छोड़ देते हैं पर कभी-कभी तो अपने जीवन को गलत मार्गों पर ले जाते हैं। तो यह सरकार का और समाज का नैतिक दायित्व है कि वह इन संस्थानों में इस प्रकार की भाषाओं को हटाने में अपना योगदान दे।
कोर्ट की भाषा और आम जनता
यह कई बार कहा जाता है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जिस व्यक्ति के प्रति जज न्याय कर रहे हैं और वकील जिसके लिए मुकदमा दायर करके अपना वहां पर तर्क कर रहा है उस व्यक्ति के पक्ष में विपक्ष में बोल रहा है तो उसे व्यक्ति को उसके बारे में कुछ भी पता नहीं होता है। तब वह कैसे कहेगा कि क्या सही है क्या गलत है? और जो भाषा वह समझता नहीं है उसी भाषा में उसको न्याय या ऑर्डर, जजमेंट लिखकर दे दिया जाता है। यह हमारे देश का बड़ा दुर्भाग्य है कि हमारा इतना बड़ा राष्ट्र है कि इसमें यूरोप जैसा पूरा का पूरा महाद्वीप समा जाए।
यूरोप से हमारे देश की तुलना
वहां की जितनी जनसंख्या है उसे ज्यादा डेढ़ गुना तो हमारे यहां पर केवल वोटर होते हैं। तो फिर हमसे हमारे लिए व्यवस्था क्यों नहीं की जा सकती ? यह व्यवस्था राज्य स्तरों पर भी की जा सकती है और राष्ट्रीय स्तरों पर भी की जा सकती है यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट में ही नहीं की जा सकती ऐसा नहीं है यह सुप्रीम कोर्ट में तो की ही जा सकती है यह हाईकोर्ट और सभी हाईकोर्ट में भी की जा सकती है। यह प्रतियोगिता परीक्षाओं का माध्यम भी बनाया जा सकता है। थोड़े कुछ लोग उर्दू भाषी हैं और कुछ ही शालाएं उर्दू में चलती हैं तो राष्ट्रीय स्तर की अनेक परीक्षाओं में भी हिंदी और अंग्रेजी के साथ उर्दू को एक माध्यम बना दिया जाता है। यदि उर्दू को एक माध्यम बना दिया जाता है तो उतनी ही भाषा संख्या में भाषा भाषी लोगों को परीक्षा का माध्यम क्यों नहीं बनाया जा सकता ? भारत में उर्दू और उसकी फारसी लिपि में उर्दू को पढ़ने लिखने वाले लोगों की संख्या इतनी अधिक नहीं है कि उसे राष्ट्रीय स्तर पर आप केवल उर्दू को यह सुविधा दो और बाकी भाषाओं को न दो। सचमुच यह घोर अन्याय है कि आप किसी अन्य भाषाओं में यह सुविधा नहीं देते। किंतु उर्दू को ही देते हैं हिंदी और अंग्रेजी को देते हैं।
हमें अपनी भाषाओं का सम्मान करना चाहिए
हमें भारतीय होने के नाते यह आवश्यक है कि हमें पूरा पश्चिम उत्तर दक्षिण की भाषाओं को अपना दिल खोलकर उदारता से उन्हें सीखना समझना चाहिए और प्रयास करने चाहिए कि हर व्यक्ति को यह आग्रह नहीं करनी चाहिए कि वह एक ही भाषा सीखे। जब आप दूसरों की भाषा नहीं सीख सकते तब आप अपनी भाषा ही दूसरों को सीखने का प्रयास क्यों करवाते हैं। जैसे जो लोग अंग्रेजी जानते हैं पढ़ते लिखते हैं तो वे यह आग्रह क्यों करते हैं कि वह दूसरों से भी वही भाषा सीखने और व्यवहार करने को कहें। इसके साथ ही जो लोग हिंदी भाषी हैं। वे यह आग्रह ही क्यों करते हैं कि तमिल और तेलुगु लोग हिंदी भाषा में बात करें। लेकिन आप तमिल तेलुगू मलयालम में से कोई भी भाषा नहीं सीखेंगे। यह अनुचित है। हमें एक दूसरे को स्वीकार करना चाहिए। एक दूसरे की संस्कृति हमारी एक ही संस्कृति है। संस्कृत में कोई भिन्नता नहीं है। किंतु हमें भाषाई रूप में भी एक दूसरे को स्वीकार करना चाहिए और भारतवर्ष में यह हजारों वर्षों से चला आ रहा है। इस पर कभी किसी ने कोई विवाद नहीं किया है। अतः हमें इस भावना को इस आंदोलन को शीघ्रता से आगे बढ़ाना चाहिए और इसे स्वीकार करना चाहिए कि हमें अपनी स्थानीय भाषाओं में अर्थात जो राज्य स्तर की भाषाएं हैं उनमें तकनीकी इंजीनियरिंग और चिकित्सा सेवा के कोर्स इसका अध्ययन अध्यापन करने के लिए शीघ्र ही सारे दरवाजे खोल देने चाहिए। जो विद्यार्थी एक राज्य से दूसरे राज्य में इस तरह की शिक्षा ग्रहण करना चाहता है वहां उन्हें उस प्रकार की भाषा सीखने के लिए अनुकूलता प्रदान करनी चाहिए।
विदेश में जाकर उनकी भाषा सीखने से अच्छा
क्योंकि जब यहां के विद्यार्थी बहुत बड़ी फीस भरकर यूक्रेन आदि देशों में जाते हैं रूस में जाते हैं जर्मनी में जाते हैं तो वह वहां की भाषाओं को सीखते हैं और वहां पर अपनी डिग्री में अध्ययन करते हैं। जब वह विदेश में यह कार्य कर सकते हैं तो अपने यहां क्यों नहीं कर सकते। सारा धन वहां गँवाकर आना ही क्या हमारी समझदारी है।
मानसिक परतंत्रता का त्याग करें
अनेकों वर्षों तक अंग्रेजों की गुलामी में परतंत्रता में रहने के बाद लोगों में यह बात घर कर गई है। और अंग्रेजों ने और काले अंग्रेजों ने यह बात बहुत प्रयास करके स्थिर करने की कोशिश की है कि कोई भी अच्छा कार्य अंग्रेजी के माध्यम से ही हो सकता है। यह निहायत थी कपट भरा व्यवहार है। जो यह निर्धारित करता है कि सरकार की जो भी समृद्धि है जो भी धन है जो भी पद है वह केवल काले अंग्रेजों के समूह तक ही सीमित रहे और उनके परिवारों तक ही सीमित रहे। वह अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाते हैं। उन्हें विदेश भेजते रहें और वहां से आकर यहां के जो बड़े-बड़े पद हैं उन पर वही सवार होते रहें। और ये इतने मूर्ख होते हैं कि भारत में आकर जब इन्हें बड़ी-बड़ी पोस्ट मिल जाती है ये लोग बड़े-बड़े पदों पर हो जाते हैं तो ऐसे उनके कार्यालय में वह ऐसे पौधे लगवाते हैं जो पौधे उत्तरी ध्रुव ध्रुवीय प्रदेश में जहां पर बहुत बर्फ गिरती है बहुत ठंड होती है वैसे पौधे वह यहां पर लगवा देते हैं। वह यह भी नहीं सोचते कि यह पौधे यह पेड़ यहां की जलवायु के लिए उचित है कि नहीं है। जैसे नीलगिरी के पौधे देखिए। आप जहां देखो वहां पर मिल जाएंगे। किसी भी ऑफिस में स्कूल में उन मूर्खों के होने से पौधे लगवा दिए हैं जबकि वे पौधे न तो पक्षियों के काम आते हैं न हीं वे बच्चों के स्वास्थ्य का वर्धन और संरक्षण करते हैं न उन्हें छाया देते हैं न उन्हें किसी प्रकार के फल देते हैं। फिर भी अंग्रेजी मानसिकता के कारण ऐसे लोगों ने ऐसे पेड़ पौधों की भरमार कर दी है। उसी प्रकार जहां पर भारत में स्वाभाविक रूप से जैव विविधता पाई जाती है ऐसे मूर्खों ने पूरे जंगलों में सागौन से जंगलों को भर दिए हैं। और वहां पर जैव विविधता पूरी तरह नष्ट हो गई है। वहां पर जल का अभाव हो गया है। वहां पर पक्षियों और जंगली प्राणियों का अभाव हो गया है। और जैव विविधता नष्ट हो गई है। उसके बदले ऐसे लोग जो विदेशी मानसिकता से पढ़कर आए थे उन्होंने सरकार को यह आईडिया दे दिया कि इससे सरकार को बहुत पैसे मिलेंगे। अब सरकार यहां पर शासन करने के लिए, राज्य की व्यवस्था को संभालने के लिए कार्य करें अथवा तो वह एक व्यापारिक केंद्र बनकर एक व्यापारिक समूह बनकर कार्य कर रही है कि ऐसे पेड़ लगाओ तो इससे बहुत पैसे मिलेंगे। और केवल पैसे से ही अगर सब कुछ हो जाता है तो फिर वह तो किसी कंपनी के द्वारा ही अच्छे से चलाया जा सकता है। उसके लिए लोकतांत्रिक रूप से चुनाव करने की क्या आवश्यकता है?
प्रकाशन उद्योग
किसी को यह एक सामान्य बात लग सकती है किंतु प्रकाशन उद्योग जो पुस्तकों से जुड़ा हुआ है। चूंकि भारत में अधिकांश पाठक जो उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं या उच्च शिक्षा प्रदान करते हैं वह सभी अंग्रेजी भाषा की पुस्तकों का प्रयोग करते हैं और उन्हें स्टैंडर्ड मानते हैं। हो सकता है उनकी यह बात सत्य हो किंतु वे यह भूल जाते हैं कि वे जिस विषय के विशेषज्ञ हैं वे उन पुस्तकों का अनुवाद कर सकते हैं अथवा तो इतने बड़े देश में उस भाषा के विशेषज्ञ अपनी भाषाओं में नए ग्रंथ लिख सकते हैं यह कोई बड़ी बात नहीं है। इजराइल पोलैंड फ्रांस जैसे जनसंख्या में छोटे-छोटे देश जिनकी जनसंख्या हमारे देश की जनसंख्या का किसी का दसवां हिस्सा है तो किसी की जनसंख्या हमारी जनसंख्या की 100 वां हिस्सा है, फिर भी वे लोग अपनी भाषा में उन ग्रंथों को लिखते हैं अथवा अनुवादित करते हैं और फिर वही उनके देश में पढ़ते हैं। इसलिए यह प्रकाशन उद्योग जो अंग्रेजी के नाम पर विदेशियों के हाथ में चला जाता है हमारे धन को विदेश भेज देता है और वह ड्रेन थ्योरी यहां पर लागू हो जाती है कि धन का प्रवाह बहुत अधिक विदेश में चला जाता है। और यह व्यर्थ ही चला जाता है। हम इसकी रक्षा कर सकते हैं। हम इसे बचा सकते हैं। और हमें यह अवश्य बचाना चाहिए। वह धन हमारी प्रादेशिक भाषाओं के प्रकाशन के नाम पर सभी प्रदेशों में विभक्त हो जाएगा और हिंदी आदि हमारी भाषाओं में भी आ जाएगा। अतः हमें इस बात का अवश्य ध्यान रखना चाहिए।
निष्कर्ष
इस लेख में लिखी हुई सभी बातों से यह बात पता चलती है कि भाषा हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण है। भाषा की रक्षा करना हमारे लिए अपनी, अपने अस्तित्व की रक्षा करने जैसा नहीं है बल्कि अपनी रक्षा करना ही है। अतः हमें अपने हर कीमत पर अपनी भाषा, अपनी भाषा में शिक्षा के माध्यम और अपनी भाषाओं में अपना मनोरंजन पठन श्रवण आदि का निश्चय ही विकास करना चाहिए। आखिर हम दूसरों के पीछे-पीछे कब तक चलते रहेंगे और उनकी झिड़कियाँ सुनते रहेंगे।
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