ख. रमैणी समग्र । (Ramaini Samagra)
(3)रमैंणी
तू सकल गेहगरा
[ राग सूहौ ]
तू सकल गेहगरा, सफ सफा दिलदार दीदार,
तेरी कुदरति किनहूँ न जानी, पीर मुरीद काजी मुसलमानी ।।
देवी देव सुर नर गण गंध्रप, ब्रह्मा देव महेसुर ।
तेरी कुदरत तिनहूँ न जाँनी । । टेक । ।
शब्दार्थ-
गहगरा = सर्वव्यापी, प्रकृति= शक्ति। गंध्रप = गन्धर्व । सफा=स्वच्छ, दीदार =दर्शन, कुदरति =प्रकृति। सफ़ा के हिंदी अर्थ · पवित्र; पाक; निर्मल; शुद्ध · साफ़; स्पष्ट; स्वच्छ · ख़ाली; रहित। सफ= १. पंक्ति । कतार । बाँधना । २. लंबी चटाई । सीतल पाटी । ३. बिछावन । फर्श । बिस्तर । ४. रेखा । लकीर ।
दिलदार वि० [फा़०] १. उदार । दाता । २. रसिक । ३. प्रेमी । प्रिय । वह जिससे प्रेम किया जाय ।
कुदरत संज्ञा स्त्री० [अ० कुद्रत] १. शक्ति । प्रभुत्व । इखतियार । सामर्थ्य ।
व्याख्या –
तू सकल गेहगरा, सफ सफा दिलदार दीदार,
तेरी कुदरति किनहूँ न जानी, पीर मुरीद काजी मुसलमानी ।।
हे ईश्वर तू सर्व व्याप्त है सभी में व्याप्त है सारी सृष्टि का आधार है तो उन लोगों के ह्रदय में प्रकट हो जाता है जो तुझे प्रेम करते हैं और अपने ह्रदय को तेरे प्रेम से शुद्ध कर लेते हैं तेरी महिमा कोई भी जान नहीं पाया है चाहे वह कोई पीर हो मुरीद हो काजी आदि इस्लाम को मानने वालों में हो (या)
देवी देव सुर नर गण गंध्रप, ब्रह्मा देव महेसुर ।
तेरी कुदरत तिनहूँ न जाँनी । । टेक । ।
अथवा कोई देवी देवता स्वर्ग में रहने वाले मनुष्य गण गंधर्व ब्रह्मा शिव आदि भी तेरी कुदरत अर्थात तेरी महिमा को नहीं जान सके हैं ।
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|| एकपदी रमैंनी ||
काजी सो जो काया बिचारै
काजी सो जो काया बिचारै, तेल दीप में बाती जारै ।।
तेल दीप मैं बाती । जोति चीन्हि जे काजी कहै ।।
मुलनां बंग देइ सुर जाँनी आप मुसला बैठा ताँनी । ।
मैं जे करै निवाजा, सो मुलनाँ सरबत्तरि गाजा ।।
आपुन सेष सहज मैं महल उठावा, चंद सूर बिचि तारी लावा ।।
अर्ध उर्ध बिचि आनि उतारा, सोइ सेष तिहूँ लोक पियारा ।।
जंगम जोग बिचारै जहूँवाँ, जीव सीव करि एकै ठऊवाँ ।।
चित चेतनि करि पूजा लावा, तेतौ जंगम नाँउ कहावा ।।
जोगी भसम करै भौ मारी, सहज गहै बिचार बिचारी ।।
अनभै घट परचा सू बोलै, सो जोगी निहचल कदे न डोलै ।।
जैन जीव का करहु उबारा, कौंण जीव का करहुं उधारा ।।
कहाँ बसै चौरासी का देव, लही मुकति जे जाँनौ भेव ।।
भगता तिरण मतै संसारी, तिरण तत ते लेहु बिचारी ।।
प्रीति जाँनि रॉम जे कहै, दास नाँउँ सो भगता लहै ।।
पंडित चारि वेद गुँण गावा, आदि अंत करि पूत कहावा ।।
उतपति परलै कहौ बिचारी, संसा घालौ सबै निवारी ।।
अरधक उरधक ये संन्यासी, ते सब लागि रहैं अबिनासी ।।
अजरावर कौं डिढ़ करि गहै, सो सन्यासी उन्मन रहै ।।
जिहि घर चाल रची ब्रह्मंडा, पृथमीं मारि करी नव खंडा ।।
अविगत पुरिस की गति लखी न जाई, दास कबीर अगह रहे ल्यौं लाई ||१||
शब्दार्थ :-
मुसल्ला =चादर । अजरावर = अजर अमर, ईश्वर। अनभै =भयरहित।
व्याख्या –
काजी सो जो काया बिचारै, तेल दीप में बाती जारै ।।
तेल दीप मैं बाती । जोति चीन्हि जे काजी कहै ।।
कबीरदास जी कहते हैं काजी वह है जो काया अर्थात शरीर की नश्वरता का विचार करता है जैसे तेल दीपक और बाती, बाती दीपक के अंदर जलती है दीपक मिट्टी का बना होता है और उसमें तेल डाला जाता है इस प्रकार जो इस शरीर रूपी मिट्टी के दीपक में रहने वाली चेतना रूपी बाती है उससे जो प्रकाश हो रहा है उसको जो जानता है उसके आधार को जो जानता है अर्थात ईश्वर को जो जानता है वही काजी कहलाने के योग्य है।
मुलनां बंग देइ सुर जाँनी आप मुसला बैठा ताँनी । ।
मैं जे करै निवाजा, सो मुलनाँ सरबत्तरि गाजा ।।
कबीरदास जी कहते हैं कि मौलवी कुरान की आयतों या सुरसुरा के अनुसार बांग देने लगता है और स्वयं ही चादर फैला कर बैठ जाता है। अपने अंतर में जो ईश्वर को नवाजता है अर्थात सुसज्जित करता है ऐसा मौलवी सर्वत्र गाजता है, गर्जना करता है।
आपुन सेष सहज मैं महल उठावा, चंद सूर बिचि तारी लावा ।।
अर्ध उर्ध बिचि आनि उतारा, सोइ सेष तिहूँ लोक पियारा ।।
शेख वह है जो अपनी सहज अवस्था मैं जागृत रहता है उसे प्राप्त कर लेता है तथा इड़ा और पिंगला, सूर्य और चंद्र नाड़ी के मध्य अपना ध्यान केंद्रित करके वह सुषुम्ना में अपने प्राणों को प्रवेश कराता है। वह ऐसे सहस्त्रदल कमल की अनुभूति करता है जो नीचे की ओर(अधोवर्ती) तथा (ऊर्ध्ववर्ती) अर्थात् ऊपर की ओर ऐसा सहस्त्र दल वाले कमल के मध्य चक्र में स्थित परमात्मा को वह प्रकाशित अनुभव करता है। अर्थात वह ऐसा महल बनाता है। ऐसा शेख तीनो लोको मैं प्रिय होता है।
जंगम जोग बिचारै जहूँवाँ, जीव सीव करि एकै ठऊवाँ ।।
चित चेतनि करि पूजा लावा, तेतौ जंगम नाँउ कहावा ।।
जंगम का अर्थ है कि जो चलायमान अर्थात एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होते रहता है अथवा चलते रहता है। स्थावर का अर्थ है जो स्थित रहता है एक स्थान पर।साधू सन्यासियों का स्वभाव रहता है कि वे एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा सदैव ही करते रहते हैं। तो कबीरदास जी कहते हैं कि सच्चा योगी साधु वह है जो यह विचार करता है की जीव और शिव क्या है और फिर जीव और शिव की एकता का अनुभव करके मस्त रहता है तल्लीन रहता है। वही जंगम नाम की उपाधि को धारण करता है।
जोगी भसम करै भौ मारी, सहज गहै बिचार बिचारी ।।
अनभै घट परचा सू बोलै, सो जोगी निहचल कदे न डोलै ।।
कबीरदास जी कहते हैं कि योगी अपनी भूमध्य के स्थान पर प्रभाव उत्पन्न करके और विचार करके इस संसार को अर्थात माया के प्रभाव को भस्म कर देता है अर्थात नष्ट कर देता है और उस निर्भय पुरुष ईश्वर को सहज ही प्राप्त कर लेता है। ऐसा योगी सदा ही निश्चल रहता है और वह फिर कभी भी डोलता नहीं है अर्थात वह अपने स्वरूप में अचल स्थित हो जाता है और अपने स्वरूप से कभी भी चलायमान नहीं होता अर्थात उसकी अनुभूति सदैव स्थिर रहती है।
जैन जीव का करहु उबारा, कौंण जीव का करहुं उधारा ।।
कहाँ बसै चौरासी का देव, लही मुकति जे जाँनौ भेव ।।
वे कहते हैं कि जैन धर्म को मानने वाले लोग सभी प्राणियों का उद्धार करना चाहते हैं और अहिंसा का पक्ष धारण करते हैं । किंतु वे यह नहीं जानते कि वे किस जीव का उद्धार कर रहे हैं अर्थात वे जीव के मूल स्वभाव को नहीं जानते वह यह भी नहीं जानते की 8400000 योनियों में भ्रमण करने वाला वह जीव और उसका स्वामी कहां पर निवास करता है यदि वे यह भेद जान लेंगे तो वे मुक्ति को प्राप्त कर लेंगे।
भगता तिरण मतै संसारी, तिरण तत ते लेहु बिचारी ।।
प्रीति जाँनि रॉम जे कहै, दास नाँउँ सो भगता लहै ।।
जो भक्त इस संसार सागर से पार होने का संकल्प करते हैं उन्हें उस तत्व का विचार कर लेना चाहिए जिससे यह संसार तर जाता है उस ईश्वर की प्रीति को जानकर जो राम नाम लेता है ऐसा दास इस संसार सागर से तर जाता है।
पंडित चारि वेद गुँण गावा, आदि अंत करि पूत कहावा ।।
उतपति परलै कहौ बिचारी, संसा घालौ सबै निवारी ।।
पंडित अथवा ब्राह्मण चारों ही वेदों के गुण गाते रहते हैं और सृष्टि के आरंभ से ही ब्रह्मा के पुत्र कहला कर आदि से अंत तक अधिक महत्व पाते हैं उत्पत्ति और प्रलय को विचार कर कहते हैं। उनसे वह कहते हैं कि इस इस संसाररूपी संशय के मूल को जान लो अर्थात उसके मूल का अनुभव कर लो तो सभी विघ्न बाधाओं का निवारण हो जाएगा।
अरधक उरधक ये संन्यासी, ते सब लागि रहैं अबिनासी ।।
अजरावर कौं डिढ़ करि गहै, सो सन्यासी उन्मन रहै ।।
जो सन्यासी गण अध: और ऊर्ध्व को जानते हैं वे सभी अविनाशी तत्व से जुड़े रहते हैं उसके अनुभव से संपन्न रहते हैं। अजर अमर को दृढ़ करके जिन्होंने अनुभव कर लिया है वह सन्यासी सदा उन्मनी(एक योग मुद्रा जो ध्यान कि अवस्था में कि जाती है किंतु सिद्धों कि सहज सिद्ध होती है।) अवस्था में तल्लीन रहते हैं।
जिहि घर चाल रची ब्रह्मंडा, पृथमीं मारि करी नव खंडा ।।
अविगत पुरिस की गति लखी न जाई, दास कबीर अगह रहे ल्यौं लाई ||१||
जिसने ग्रहों की चाल अल को निर्धारित किया है और इस संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना की है और पृथ्वी को आघात पहुंचा कर नौ खंडों में विभाजित कर दिया है। ऐसे अविगत अर्थात जो सदा वर्तमान है ऐसे पुरुष की गति को देखा नहीं जा सकता, जाना नहीं जा सकता। कबीरदास जी कहते हैं कि दास कबीर ने उस अगम पुरुष के प्रति ही अपनी प्रीति स्थापित की है और उसमें लगे हुए हैं।
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